टपक सिंचाई पद्धति क्या हे? फ़ायदे और नुकशान

तो दोस्तों इस आर्टिकल के माध्यम से आज हम बात करने वाले हे टपक सिंचाई (ड्रिप सिंचाई ) पद्धति के बारे में जिनको इंग्लिश में Drip Irrigation कहा जाता हे टपक सिचाई या ड्रिप इर्रिगेशन पौधे को पानी देने की एक विधि हे जिसके इस्तमाल करने से आप कम पानी और खाद बचत करके ज्यादा उत्पादन ले सकते हे तो चलो दोस्तों टपक सिचाई के बारे में हम और भी अधिक जानकारी को हम जान लेते हे। 

 

टपक सिंचाई पद्धति क्या हे?

टपक सिंचाई पद्धति यानिकि प्लास्टिक की नलियों के माध्यम से पौधे को सीधे उनके जड़ो में बूंद – बूंद करके पानी प्रदान करने की विधि को टपक सिंचाई पद्धति (Drip Irrigation ) कहा जाता हे या फिर टपक सिंचाई एक पद्धति हे जिसका इस्तमाल करके पानी को मंद गति से प्लास्टिक के पाइप के माध्यम से पौधे की जड़ो को प्रदान किया जाता हे। 

सरल भाषा में कहा जाये तो पौधे को सीधे जड़ो में बूंद बूंद करके पानी पहुंचना जिसे टपक सिंचाई कहा जाता हे। 

टपक सिंचाई पद्धति के बारे में सामान्य जानकारी

टपक सिंचाई पद्धति का सबसे प्रथम आविष्कार इज़रायल में हुआ था। 

टपक सिंचाई पद्धति के द्रारा पानी को सीधे पौधे या पेड़ो की जड़ो में बून्द बून्द करके पानी टपकाया जाता हे जिसके लिए वाल्व , प्लास्टिक की नलियों और एमिटर का नेटवर्क लगाना पड़ता हे। 

पानी को प्लास्टिक की नलियों के माध्यम से सीधे पौधे की जड़ो में पहुंचाता जाता हे जिससे पानी और समय दोनों का बचाव होता हे परंपरागत चालू सिंचाई के द्रारा पानी का योग्य इस्तमाल नहीं होता था यानिकि अधिक पानी जो की पौधे को मिलना चाहिए वो ज़मीन में रिस कर या सूर्य प्रकाश की वजह से वाष्पीकरण हो जाता हे इसलिए पानी का योग्य इस्तमाल करने के लिए टपक सिंचाई पद्धति अनिवार्य उपाय हे जिनके माध्यम से पानी का कम रिसाव और वाष्पीकरण भी कम होता हे जिस वजह से पौधे या फसलों को सही मात्रा में पानी मिल जाता हे और कम खर्च में ज्यादा उत्पादन लिया जा सकता हे। 

इस सिंचाई पद्धति में आपके पास पानी का नियंत्रण होता हे यानिकि आप जब चाहे तब पौधे को योग्य मात्रा में पानी दे सकते हे। 

टपक सिंचाई से आप उर्वरक आपूर्ति करने की प्रक्रिया फर्टिगेशन कहलाती हे। जो पोषक तत्व की लीचिंग और वाष्पीकरण नुकशान पर अंकुश लगाकर सही समय पर उपयुक्त फसल पोषण प्रदान करती हे। 

भारत में टपक सिंचाई पद्धति के अंतर्गत सर्वाधिक क्षेत्रफल वाले महाराष्ट्र और तमिलनाडु राज्य मुख्य हे। 

टपक सिंचाई प्रणाली के घटक

हेडर असेंबली

हेडर असेंबली यानिकि बाईपास , नॉन रिटर्न वॉल्व जो टपक सिंचाई का दबाव एवम गति नियंत्रण करने के लिए बाईपास असेंबली का इस्तमाल किया जाता हे। 

फिल्टर्स 

पानी में रहेल कचरे , माटी या रेत के कण , शैवाल यानिकि कोई भी कचरे से डीपर्स के छिंद्र बंद हो जाने की संभावना रहती हे इस लिए पानी के कचरे को साफ करना अनिवार्य होता हे इस प्रक्रिया में स्क्रीन फ़िल्टर , सैड फ़िल्टर आदि का समावेश होता हे यानिकि पानी को साफ करने के लिए अलग अलग फ़िल्टर का इस्तमाल किया जाता हे। 

रसायन और खाद देने के साधन – व्हेचुंरी , फर्टिलाइजर टेंक

इस पद्धति में पौधों को रासायनिक खादों की पूर्ति वेंचुरी और फर्टिलाइजर पम्प के माध्यम से किया जाता हे। 

वेंचुरी 

यह एक दाब के अंतर पर चलने वाला यंत्र हे जिससे रासायनिक प्रक्रिया से खाद और रसायन इसके माध्यम से उचित मात्रा में प्रदान किया जा सकता हे यानिकि उचित गति से उचित तरल प्रदार्थ डाले जा सकते हे।

फर्टिलाइजर टैंक 

फर्टिलाइजर टैंक में तरल खाद भर कर दाब नियंत्रित से रासायनिक द्रव्य और खाद तुरंत छोड़ सकते हे।

मेनलाइन

मेनलाइन पम्प से सबमेन तक पानी पहुंचने के लिए उपयोग की जाती हे। 

सबमेन लाइन 

मेनलाइन के माध्यम से पानी सबमेन द्रारा लेटरल तक पहुँचता हे सबमेन के लिए पी-वी-सी पाइप का इस्तमाल किया जाता हे सबमेन को जमीन के अंदर करीब डेढ़ से दो फिट गहराई पर रखते हे और गति नियंत्रण करने के लिए सबमेन के शरुआत में वॉल्व जुड़ा होता हे। 

वॉल्व 

पानी के प्रवाह और दबाव को नियंत्रित करने के लिए वॉल्व लगाए जाते हे। 

लेटरल लाइन 

सबमेन का पानी लेटरल के द्रारा पुरे खेत में पहुंचाता जाता हे। 

अमीटर्स / ड्रिपर 

टपक सिंचाई पद्धति का प्रमुख अंग अमीटर्स / ड्रिपर हे। ऑनलाइन /इनलाइन ड्रिपर का प्रति घंटा प्रवाह और संख्या पौधे को पानी की अधिकतम जरुरत के अनुसार निश्चित किया जाता हे।

टपक सिंचाई पद्धति की विशेषताएँ

इस पद्धति का उपयोग करके पानी , समय और महेनत में होने वाले खर्च कम होता हे। 

टपक सिंचाई के माध्यम से पौधे को अंत्यत धीमी गति से पानी दिया जाता हे। 

पौधे को सही मात्रा में पर्याप्त पानी मिलता हे। 

ज़मीन में वायु और उचित क्षमता स्थिति बनी रहने पर पौधे की वृद्धि और विकास तेज़ी से होता हे।

टपक सिंचाई पद्धति के लाभ ( फ़ायदे )

पौधे को जरुरत के हिसाब से पानी मिलने पर पौधे या फसल के उत्पादन में वृद्धि होती हे यानिकि फल , सब्जी जैसी अन्य फसलों के उत्पादन में करीब 20 से 50 बढ़ोतरी होती हे। 

इस पद्धति के माध्यम से करीब 60 % पानी की बचत होती हे यानि पानी खर्च भी कम होता हे। 

पौधे की जड़ो में फर्टिगेशन से पोषकतत्व को सही मात्रा में सीधे पौधे की जड़ो में पंहुचा सकते हे जिसे पौधे उपयुक्त पोषकतत्व इस्तमाल कर पाते हे। 

टपक सिंचाई पद्धति के माध्यम से 30 से 45 प्रतिशत तकरासयनिक खाद की बचत की जा सकती हे।

इस पद्धति का इस्तमाल करके अनावश्यक ज़मीन सुखी रहने रहने पर खरपानवार विकसित नहीं होती जिसकी वजह से ज़मीन में मौजूद सभी पोषकतत्व केवल फसल या पौधे को ही मिलते हे। 

ज़मीन में निराई , खुदाई और कटाई आदि काम बहेतर तरीके से किये जा सकते हे जिससे समय , महेनत और पैसो की बचत भी होती हे। 

टपक सिंचाई पद्धति के माध्यम से उर्वरको को अनावश्यक बर्बाद को रोका जा सकता हे या कम किया जाता हे। 

पौधे या फसल का वृद्धि व विकास अच्छा होता हे। 

कम समय , महेनत और पानी से ज्यादा उत्पादन किया जाता हे। 

शुष्क और अर्ध शुष्क क्षेत्रों में भी की जाती हे।

पानी की कमी वाले क्षेत्रों के लिए टपक सिंचाई पद्धति बहुत ही फायदेकारक साबित होती हे। 

पानी से फैलने वाले पादप रोगो के फैलने की संभावना कम रहती हे।

इस पद्धति से ऊर्जा की भी बचत होती हे।  

टपक सिंचाई पद्धति के नुकशान

इस पद्धति का इस्तमाल करने से शरुआती खर्च ज्यादा होता हे। 

लम्बी दुरी वाली फसलो के लिए ही उपलब्ध हे।

इस पद्धति में उपयोग होने वाली प्लास्टिक की पाइपों को चूहों द्रारा क्षति पहुंचाने का खतरा होता हे।

इस सिंचाई विधि में पाइपों के समीप लवण के संचय का खतरा होता हे।

तो दोस्तों अगर आपको ये जानकारी पसंद हे तो आप इस जानकारी को अपने दोस्तों के साथ भी सेर करे। 

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