हमेंशा सीखते ही रहना चाहिए – Hindi Motivational Story

       तो दोस्तों इस आर्टिकल के माध्यम से आज हम बात करने वाले हे एक ऐसी कहानी के बारे में जिसको पढ़कर आपके मन में ये अहंकार कभी नहीं होगा की मुझे सब कूच आता हे। और आप हर एक इन्सान से कूच ना कूच सीखते ही रहेंगे। तो चलो दोस्तों इस कहानी को हम शरू करते हे। Best Hindi Motivational Story

Best Motivation Story In Hindi

Best Hindi Motivational Story

      जनकपुर नामक एक गांव था। जिसमे एक मूर्तिकार रहता था जो की तरह तरह की बहुत ही सुंदर और अच्छी मुर्तिया बनाता था। उसका एक बेटा था जो की बहुत ही छोटा था। वो मूर्तिकार प्रतिदिन सुबह एक मूर्ति बनाता और श्याम होते ही वो उस मूर्ति को बाज़ार में बेच डालता था। यानिकि उस मूर्तिकार की महीने की कमाइ करीब 20 हज़ार के आसपास हो जाती हे और उससे वो अपना जीवन गुजार बहुत अच्छे से करता था।

      धीरे धीरे मूर्तिकार की उम्र बढ़ती गइ इसलिए उनको मुर्तिया बनाने में दिक़्क़त होने लगी यानिकि वो पहले जैसी मुर्तिया बना नहीं सकता था। और उनकी बनाई हुइ मूर्ति जो 500 से 700 क़ीमत में ख़रीदी जाती थी वो 300 से 400 की क़ीमत में ख़रीदी जाती थी। अब मूर्तिकार जब भी कोइ मूर्ति बनाता तो उसके हाथ कांपने लगते थे। इसलिए उनको बहुत चिंता होने लगी और फिर उसने सोचा की क्यों में मेरा ये मूर्ति बनाने का हुनर अपने बेटे को सिखादु। फिर उसने अपने बेटे को मुर्तिया कैसे बनाई जाती हे ये सिखाने लगा। और उस मूर्तिकार ने भी उसके पिता से ही ये मूर्ति बनाने का हुनर सीखा था।

अब धीरे धीरे मूर्तिकार अपने बेटे से मुर्तिया कैसे बनाई जाती हे कैसे आकर दिए जाते हे कैसे कलर लिए जाते हे ये सब सिखाने लगता हे। धीरे धीरे बेटा मुर्तिया बनाना सिख जाता हे और एक बार वो खुद अपने हाथो से एक मूर्ति बनाता हे और अपने पिताजी से कहता हे पिताजी आज मैने खुद एक मूर्ति बनाई हे तब उसके पिताजी बोलतें हे की तुम अब बाज़ार में जाओ और इस मूर्ति को बेच डालो। तब बेटा बाजार में जाता हे और अपनी बनाई हुइ मूर्ति को 100 रुपये में बेच के वापस घर आता हे और अपने पिताजी को बताया तो उसके पिताजी बहुत खुश हुए और कहा की बेटा मुझे बहुत ख़ुशी हुईं की आज तुमने अपनी पहली मूर्ति को बेच दिया। मगर उनका बेटा ख़ुश नहीं था और वो अपने पिताजी से बोला की पिताजी ऐसा क्यू आपकी मूर्ति की क़ीमत 500 से लेकर 700 रुपये में ख़रीदी जाती थी और मेरी मूर्ति क्यों 100 रुपये में खरीदी जाती हे। पिताजी आप मुझे अभी भी सिखाये ताकि मेरी बनाई हुई मूर्ति भी ऊँचे दामों में बिक सके। तब उसके पिताजी ने उसके बेटे को दो महीनो तक और मूर्ति बनाने का हुनर सिखाते गए। 

 अब बेटे ने तीन महीनो के बाद एक खुद की मूर्ति बनाई जो पहले से बहुत अच्छी और सुंदर थी। उसने अपने पिताजी को बताई उनके पिताजी बहुत ख़ुश हुए और उसको बाजार में बेच डालने के लिए कहा वो लड़का फिर बाजार गया और अपनी मूर्ति को बेंचकर वापस अपने घर आया। और अपने पिताजी से बोला की पिताजी में अब भी ख़ुश नहीं हु क्योकि मेरी बनाई हुईं मूर्ति केवल 300 रुपये में ही खरीदी गईं। आपको अभी भी कुछ ऐसा पता हे जो मुझे नहीं पता मुझे वो सीखना हे। फिर से पिताजी ने अपने बेटे को मूर्ति बनाने का हुनर सिखाया और फिर से बेटे ने मूर्ति बनाई और बाजार जाकर बेच डाली तो वो मूर्ति 500 रुपये में खरीदी गईं। उसने फिर से सब कूच अपने पिताजी को बताया तो उसके पिताजी बोले बेटा तुम निराश मत हो तुम अब प्रगति कर रहे हो में तुम्हे और भी अच्छी और सुन्दर मूर्ति कैसे बनाते हे ये सिखाता रहूँगा।

    पिताजी अपने बेटे को कूच महीनों तक कैसे अच्छी और सुंदर मूर्ति बनाई जाती हे ये सिखाते गए। फिर एक बार बेटे ने एक अच्छी और बहुत ही आकर्षक और सुंदर मूर्ति बनाई और वो बाजार गया उस मूर्ति को बेचने के लिए। और मूर्ति बेचकर बेटा वापस अपने घर आया तो इस बार बेटा बहुत ख़ुश था और उसने अपने पिताजी से कहा की पिताजी मेरी बनाई हुई मूर्ति आज 1000 रुपये में ख़रीदी गइ। तो उसके पिताजी भी बहुत ख़ुश हुए। और अपने बेटे से बोले की बेटा अब में तुमको बताऊँगा की मूर्ति को 1500 रुपये में कैसे बेचते हे। तब उसका बेटा बोलता हे की पिताजी अब मुझे सीखने की कोइ जरुरत नहीं हे क्योकि आपने अब तक 700 रुपये से ज्यादा में मूर्ति बेचीं नहीं हे और आप मुझे सिखायेंगे की मूर्ति को 1500 रुपये में कैसे बेचते हे। तब पिताजी ने बहुत सुंदर ज़वाब दिया की बेटा अब तुम्हारी मूर्ति 1000 रुपये से ज़्यादा नहीं बिक पायेंगी क्योकि अब तेरा सीखना जो बंद हो गया हे। में भी जब अपने पिता से यानिकि तुम्हारे दादाजी से मुर्तिया बनाने का काम सिख रहा था जो अपनी मूर्ति को 300 रुपये में बेच दिया करते थे। तब मैने भी अपनी खुद की मूर्ति 500 रुपये में बेचीं थी तो मैने भी अपने पिता से यही कहा था की बस पिताजी आपने अपनी जिंदगी में 300 रुपये से ज्यादा की मूर्ति बेचीं नहीं हे और मैने खुद आपसे भी बहेतर 500 रुपये की मूर्ति बनाई हे तो अब में आपसे क्या सिखु। तो मैने उस दिन से सीखना बंद कर दिया और आज तक में भी 500 से 700 रुपये तक ही मूर्ति को बेच पा रहा हु। क्योकि मेरे अंदर एक अहंकार था की में पूरी तरह से मूर्ति बनाना सिख गया हु। ये अहंकार ज्ञान का सबसे बड़ा दुश्मन होता हे और ये किसी भी ज्ञानी के लिए किसी ज़हर से कम नहीं हे जो धीरे धीरे हमें रोक देता हे और ख़त्म कर देता हे। इसलिए हमेंशा सीखते ही रहना चाहिए। Hindi Motivational Story

     तो दोस्तों इस कहानी से हमें ये सीखना चाहिए की जब हम ये मान लेते हे की में इससे कैसे सीखू में तो इससे भी और अच्छा कर रहा हु तब हम सब सीखना बंद कर लेते हे। और जिसका सीखना बंद हो जाता हे वो वही रुक जाता हे। हम हर किसी इन्सान से थोड़ा थोड़ा बहुत कूच सिख सकते हे क्योकि हर इन्सान सब कूच नहीं जानता। मगर हर इंसान थोड़ा थोड़ा जरूर जानता हे। इसलिए हमें हर इन्सान से कूच ना कूच सीखते ही रहना चाहिए।

  तो दोस्तों अगर आपको ये कहानी पसंद हे तो आप इस कहानी की अपने दोस्तों के साथ भी सेर करे क्योकि हर इन्सान को हमेंशा सीखते और सिखाते रहना चाहिए।

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